ऋषि ने थके हुए स्वर में कहा,
“रिया… मैंने तो सिर्फ़ सच बोला है। मैं तुम्हें चाहता हूँ, स्वरा को नहीं। लेकिन अब… अब ये सब कैसे संभालूँ, मुझे समझ नहीं आ रहा।”
विवेक जो अब तक चुप था, उसने कड़ी आवाज़ में कहा,
“संभालने का समय तुमने कब का खो दिया, ऋषि। तुम दोनों को समझ नहीं है कि यह सिर्फ़ तुम्हारा मामला नहीं है। दो परिवारों की इज़्ज़त दाँव पर है। और अगर चाचू और दादाजी तक यह सब पहुँचा… तो न सिर्फ़ रिश्ता टूटेगा, बल्कि घर भी टूट जाएगा।”
रिया ने होंठ काटे और डरते हुए बोली,
“तो क्या करूँ विवेक भाई? चुपचाप बैठकर देखती रहूँ? अगर दादाजी ने सबके सामने मुझे गलत ठहरा दिया, तो मेरा क्या होगा? मैं सब खो दूँगी…”
विवेक ने उसकी तरफ़ घूरकर देखा,
“तुम्हें अपनी बहन का दर्द नहीं दिख रहा, रिया? तुम्हें सिर्फ़ जायदाद और अपने हक़ की चिंता है? क्या यही तुम्हारा प्यार है ऋषि से—कि उसके लिए किसी की ज़िंदगी बर्बाद कर दो?”
उसके शब्द सुनकर ऋषि और रिया दोनों सन्न रह गए।
कमरे का माहौल इतना भारी था कि कोई साँस भी ज़ोर से लेने से डर रहा था।
उधर बाहर, स्वरा अपने आंसुओं को दबाते हुए दादाजी के कमरे की ओर बढ़ रही थी।
वह जानती थी—अब सच छुपाकर कोई फायदा नहीं।
लेकिन वह यह भी जानती थी कि उसके एक-एक शब्द से न सिर्फ़ उसका रिश्ता, बल्कि पूरे परिवार की नींव हिल जाएगी।
लेकिन फिर भी उसे सच बताना तो था ही जिसके लिए वह खुद को प्रिपेयर कर रही थी। किसी तरह खुद को तैयार करके वह अपने घर वापस आई और दादाजी की कमरे की तरफ बढ़ गई लेकिन उसे क्या पता था उसकी जिंदगी ने उसके साथ बहुत ही गलत किया है उसकी जिंदगी कुछ कुछ इस कदर करवट ली है कि अब कुछ भी संभालना मुश्किल है। जैसे ही वह अपने दादाजी के कमरे के बाहर पहुंचती है तो देखी है वहां उसकी चाची चाचा पहले से ही मौजूद थे उन्हें देखकर स्वरा घबरा जाती है। और घबराते हुए वह जल्दी से अंदर कदम रखती है और उसके बाद जो वह जो देखती है उसे देखकर उसके कदम लड़खड़ा जाते हैं दादाजी बेड पर लेटे हुए थे और चाची चाचू उनके पैरों के पास बैठकर रो रहे थे।
स्वरा के कदम जैसे ज़मीन में धँस गए हों।
उसने हकलाते हुए कहा,
“दा… दादाजी…?”
लेकिन उसके शब्द गले में ही अटक गए।
बिस्तर पर लेटे दादाजी की साँसें बेहद धीमी थीं, चेहरा पीला पड़ चुका था। डॉक्टर पहले ही वहाँ मौजूद थे और नब्ज़ टटोल रहे थे।
चाची सिसकते हुए बोलीं,
“स्वरा… तुम्हारे दादाजी की तबियत अचानक बहुत बिगड़ गई है। पता नहीं… पता नहीं अब क्या होगा।”
स्वरा का दिल जैसे किसी ने मुठ्ठी में जकड़ लिया। वह तेज़ी से आगे बढ़ी और दादाजी का हाथ थाम लिया। उसके भीतर उठ रहे सारे तूफ़ान—ऋषि, रिया, विवेक के शब्द—सब कुछ उस पल एक झटके में किनारे हो गया।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले,
“दादाजी… मैं हूँ यहाँ… आप कुछ मत कहिए… बस मुझे छोड़कर मत जाइए…”
डॉक्टर ने सबको पीछे हटने को कहा और नर्स को दवाई तैयार करने का इशारा किया।
चाचा ने गहरी सांस लेकर धीरे से कहा,
“ये सब… अभी किसी भी झटके को बर्दाश्त नहीं कर सकते। अगर घर में कोई विवाद है… तो उसे अभी बाहर ही रखना। दादाजी को सिर्फ़ शांति चाहिए।”
स्वरा का गला सूख गया।
वह जानती थी, सच बताने का वक़्त आ चुका था… लेकिन अब, जब दादाजी की हालत इतनी नाज़ुक है, क्या वह उन्हें इस सच का बोझ दे सकती है?
विवेक की कठोर बातें उसके कानों में गूंज उठीं—
"अगर चाचू और दादाजी तक यह सब पहुँचा… तो घर भी टूट जाएगा।"
स्वरा के आँसू थम ही नहीं रहे थे।
उसने दादाजी का हाथ कसकर थाम लिया और मन ही मन कहा,
"दादाजी… मैं सब कह दूँगी… लेकिन आपको खोने के बाद नहीं। आप ठीक हो जाएँ, फिर मैं सच छुपाऊँगी नहीं। चाहे रिश्ते टूट जाएँ, पर मैं अपने दिल का बोझ हल्का कर दूँगी।"
इतने में दादाजी की पलकों ने हल्का-सा झपकना शुरू किया।
उनकी फटी-फटी आँखें धीरे से खुलीं और उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा,
“स्वरा… सब ठीक… है न?”
यह सुनकर स्वरा का दिल काँप उठा।
अब वह क्या जवाब दे—सच या झूठ?
उसने एक गहरी सांस ली और बोली हां दादा जी सब ठीक है बस आप ठीक हो जाइए। उसके बाद सुनने के बाद दादा जी को भी थोड़ा सुकून मिला और उन्होंने अपनी आंखें वापस बंद कर ली। थोड़ी देर में डॉक्टर बाहर आए और बताया कि दादाजी की हालत बहुत खराब है उनका कोई भरोसा नहीं जब तक चल रहे हैं उन्हें किसी भी तरह की प्रॉब्लम में इंवॉल्व ना किया जाए अब उनका चलना मुश्किल है। उनकी जितनी भी जिंदगी बची है उसे खुशी से बिताने दे। जिसे शायद वह दो दिन की जगह चार दिन चल सकते हैं। डॉक्टर की बात सुनने के बाद सारा की धड़कनें रुक सी गयी ऐसा लग रहा था उसके शरीर से जान ही निकाल ली गई हो,
वह तो बीच मझधार में आकर फस चुकी थी कैसे अगर दादाजी नहीं रहे तो वह किसके लिए जिन्दा रहेगी। उसके पास एकमात्र दादाजी ही सहारा थे और अब उसके सर से दादरी के साया उठ जाने के बाद उसका कोई नहीं होगा किसके सहारे जीएगी वह जैसे-जैसे वह इन बातों के बारे में सोच रही थी उसकी आंखें बहती जा रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था वह क्या करें। उसने किसी तरह खुद को संभाला और दादाजी के पास वापस आकर उनके सर के पास बैठते हुए उनका कर सहलाने लगी,
रात का वक्त सब अपने अपने कमरे में आराम से सो रहे थे अब तक स्वरा ने किसी को कुछ बताया नहीं था। वह भी अपने कमरे में लेटी हुई थी लेकिन उसकी आंखों में नींद नहीं थी। अचानक उसे क्या हुआ वह बेड से उठी और दादाजी के कमरे की तरफ चल दी।
उसने जैसे ही कमरे में इंटर किया तो देखा दादाजी के साँसे भारी हो रही है वह सांस नहीं ले पा रहे थे। उनकी हालत देखते हुए जरा घबरा गई और रोने लगी घबराहट में से कुछ समझ नहीं आया तो वह जल्दी से दौड़ते हुए अपने चाचा के कमरे के बाहर गई और दरवाजा खटखटाते हुए बोला चाचा जी चाचा जी बाहर लिए जल्दी चलिए दादाजी की तबीयत खराब हो रही है आधी रात में उसकी चिल्लाने से पूरा घर जाग चुका था और सब अब दादा जी के कमरे में मौजूद थे। लेकिन दादाजी वह नहीं थे उनके साथ से थम चुकी थी।
आगे जारी....।
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