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स्वरा की जान निकल गयी..

स्वरा की जान निकल गई जब उसे पता चला कि उसके दादा जी अब इस दुनिया में नहीं रहे।वो वही धड़ाम की आवाज के साथ उनके पैरों में गिर गई और जोर जोर से रोने लगी।

स्वरा की आँखों से आँसुओं की धारा बह रही थी, मानो उसका पूरा संसार ही उजड़ गया हो। कमरे में सन्नाटा छा गया था, सिर्फ़ उसकी सिसकियों की आवाज़ गूँज रही थी। उसके चाचा ने उसे सहारा देकर उठाया और सीने से लगाया, लेकिन स्वरा का दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा था। दादा जी उसके लिए सिर्फ़ दादा नहीं, बल्कि एक दोस्त, एक मार्गदर्शक और उसकी सबसे बड़ी ताकत थे।

वो उन पलों को याद करने लगी जब दादा जी उसे अपनी गोद में बिठाकर पुरानी कहानियाँ सुनाया करते थे। उनकी वो हँसी, वो प्यार भरी आवाज़, और वो प्यार भरी नज़रें—सब कुछ जैसे आँखों के सामने घूमने लगा। स्वरा को याद आया कैसे दादा जी उसे हर छोटी-बड़ी बात पर हौसला देते थे, कैसे वो कहते थे, "स्वरा, दुनिया में कोई भी मुश्किल इतनी बड़ी नहीं कि तू उसका सामना न कर सके।"

उसने अपने चाचा जी से कांपती आवाज़ में पूछा, "चाचा जी, दादा जी ऐसे कैसे चले गए? वो तो कहते थे कि वो मेरी शादी में सबसे ज्यादा खुश होंगे.." उसकी बात अधूरी रह गई, और वो फिर से फूट-फूटकर रोने लगी। विमल जो उसका चाचा यानी दादा जी के बेटे है उस ने उसका माथा सहलाते हुए कहा, "बेटी, पापा जी हमेशा तुम्हारे साथ हैं। वो भले ही दिखाई न दें, लेकिन उनकी बातें, उनका प्यार, वो हमेशा तुम्हारे दिल में रहेंगे।"

कमरे में मौजूद सभी लोग खामोश थे। हर कोई दादा जी की यादों में खोया हुआ था। तभी स्वरा की नज़र दादा जी की पुरानी कुर्सी पर पड़ी, जहाँ वो हर शाम बैठकर अखबार पढ़ा करते थे। उस कुर्सी के पास रखी उनकी चश्मे की डिब्बी और अधपढ़ा अखबार अब अनाथ से लग रहे थे। स्वरा ने धीरे से उठकर उस कुर्सी को छुआ, जैसे वो दादा जी को एक बार फिर महसूस करना चाहती हो।

उसने मन ही मन ठान लिया कि दादा जी की हर सीख को वो अपने जीवन में उतारेगी। वो उनकी तरह हिम्मत वाली बनेगी, और उनकी यादों को हमेशा ज़िंदा रखेगी। उस रात, जब सब सो गए, स्वरा चुपके से दादा जी की पुरानी डायरी निकाल लाई। उसने उसे खोला और पढ़ना शुरू किया। हर पन्ने पर दादा जी की ज़िंदादिली और ज़िंदगी के प्रति उनका नज़रिया झलक रहा था। स्वरा ने आँसुओं के बीच मुस्कुराते हुए सोचा, "दादा जी, आप भले ही यहाँ नहीं हैं, लेकिन आपकी ये बातें मुझे हमेशा रास्ता दिखाएँगी।"

प्रजेंट टाइम

ओए लड़की बाहर आ कोई तेरा स्वागत फूल बिछा के नहीं करेगा समझी इस आवाज को सुन कर स्वरा जो कार में बैठी हुई अपने पुराने दिनों को याद कर रही थी वापस होश में आई और इधर उधर देखने लगी तो उसने देखा वो एक बड़े से घर के सामने आ कर रुकी है और उसके साथ बैठा वो आदमी जो उसे लेने उसके घर गया था अब वो वहां नहीं है।

उसे ऐसे अपने आप को अकेले गाड़ी में देख कर डर लगने लगा वो पहले कभी इतनी बड़ी गाड़ी में नहीं बैठी थी और आज बैठी भी तो अकेले वो हड़बड़ाते हुए गाड़ी से बाहर आने को होती है लेकिन तभी उसका लहंगा अटक जाता हैं जिसकी वजह से वो गिर जाती हैं।वो गिरने वाली होती है तो एक लेडी उसके पास खड़ी थी लेकिन उन्होंने उसे संभाला नहीं बल्कि खुद पीछे हट गई जो देख कर स्वरा की आंखे भर आई वो अभी भी गिरी हुई थी कि एक आदमी वहां आ कर उसे उठाते हुए कहता है और कितना गिरेगी अब उठ जा वैसे भी तुम्हारी औकात इतनी भी नहीं है कि तुम अहंकार राजावत के पैरों में गिरी रहो लेकिन फिर भी अहंकार राजावत तुम्हे उठने के लिए अपना हाथ देता है थामो इसे और उठ जाओ उस आदमी की बात सुनकर स्वरा की आंखे जो भरी हुई थी अब डबडबा गई उसके आंखों से आंसुओं का एक कतरा बह निकला।

स्वरा ने काँपते हाथों से उस आदमी का हाथ थामने की कोशिश की, लेकिन उसकी नज़रों में साफ़ डर और बेइज़्ज़ती का दर्द झलक रहा था। उसने जैसे ही उठना चाहा, उस आदमी ने ज़ोर से उसका हाथ खींचकर उसे खड़ा कर दिया।

उसकी नज़रें ऊपर उठीं और सामने खड़े आदमी पर गई —लंबा कद, तीखे नैन-नक्श और चेहरे पर एक ऐसी सख़्ती, जैसे मुस्कुराना उनकी फितरत में ही न हो। उनकी आँखें स्वरा को ऐसे घूर रही थीं मानो वो कोई ग़लती करके यहाँ आ गई हो।उम्र लगभग 35,36 के आस पास लेकिन देखने में ऐसा बिल्कुल नहीं लग रहा था कि वो इतने उम्र का होगा काफी अच्छी तरह खुद की पर्सनालिटी को मेंटेन किया था उसने 25,26 के लड़के भी इतने हॉट हैंडसम भी लगते होंगे जितना अहंकार इस age तक आ कर था।

खैर अहंकार ने हल्की-सी मुस्कान दी जो व्यंग्य से भरी हुई थी और कहा मुझे घूरना बंद करो इस घुंघट के नीचे से भी हम तुम्हारी आंखों में झाक सकते है।

"इतनी नाज़ुक हो तो इस घर की दहलीज़ कैसे पार करोगी? यहाँ कोई तुम्हें संभालने वाला नहीं है, समझीं?"

स्वरा के होंठ काँप रहे थे, लेकिन उसने किसी तरह अपने आँसू पोंछे और हिम्मत जुटाकर धीरे से कहा,

"मैं... मैं यहाँ बस इसके आगे के शब्द उसके गले में अटक गए।

भले ही उसने पूरी बात न बोली हो लेकिन उसकी आवाज़ में डर के साथ-साथ एक मासूमियत भी थी, जिसे सुनकर वहाँ खड़ी औरत उसे देखने लगीं।

अहंकार राजावत ने उसकी बात पर हल्की हँसी उड़ाई और करीब आकर ठंडी आवाज़ में बोला,

"याद रखो लड़की... यहाँ तुम अपनी मर्ज़ी से नहीं, मेरी मर्ज़ी से रहोगी। और मेरी मर्ज़ी के आगे किसी की नहीं चलती—न तुम्हारी, न इस दुनिया की।"और ये मिमियाना बंद करो बकरी नहीं पालनी हमें।

उसने हाथ झटकते हुए इशारा किया, और दो नौकरानियाँ आगे बढ़ीं।

"ले जाओ इसे अंदर... और ध्यान रहे, इसे इस घर के असली नियम समझा दिए जाएँ।"

स्वरा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। वो कदम-कदम पर काँप रही थी, लेकिन उसके दादा जी की यादें, उनकी कही बातें—कि कोई मुश्किल इतनी बड़ी नहीं होती जिसे वो पार न कर सके—उसके कानों में गूँज रही थीं।

वो अंदर की ओर बढ़ी, लेकिन उसके मन में कई तरह के सवाल उमड़ने लगे।

आगे जारी

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